दीप महोत्सव:धन-अन्न-जन से रोशन होती है दीपावली, धन के साथ अन्न के रूप में भगवती अन्नपूर्णा की वंदना

deepawali is illuminated by money-food-people,
Publish : 22-10-2022 8:38 PM Updated : 22-10-2022 3:08 PM
Views : 83

यह पर्व प्रतीकों से इस प्रकार समृद्ध है कि इसके प्रत्येक भाग में लोक कल्याण की प्रबल भावना दिखलाई पड़ती है। यही कारण है कि दीपों का यह महोत्सव सभी के मन में प्रसन्नता के दीप प्रज्वलित कर देता है।

 

पर्व-उत्सव की प्रकृति व स्वभाव नदियों के प्रवाह के मानिंद ही होता है। उद्‌गम से चलकर राह में जो साथ मिला, उसे लेते, कुछ को छोड़ते और कुछ को जोड़ते-समेटते चल देते हैं। ये पर्व कैसे जन्मे, इस प्रश्न के मूल तक यदि हम पहुंचें, तो उनके रूप-स्वरूप वर्तमान से भिन्न ही नज़र आएंगे। उनके आनंद का कोई एक रूप नहीं होता। पर्व भी समय, काल और स्थान को साथ लेकर हर अवसर को आनंदित करते रहते हैं। वे कुछ लेते, कुछ छोड़ते हैं।

 

लोक सांस्कृतिक पर्व

हमारे देश के पर्वों और उनकी प्रकृति की बात करें तो दीपावली सबसे बड़ा पर्व है जो कि प्रतीकों और विविधताओं से भरा हुआ है। एक भी पर्व तब तक लोकप्रिय नहीं होता, जब तक कि वह लोकहितों को लेकर या लोक के अनुकूल नहीं चलता। दीपावली पर्व धर्म, अध्यात्म, पुराण, व्यापार-व्यवसाय, समाज, परिवार और मानवीय संवेदनाओं से सम्बंधित एक भरा-पूरा लोक सांस्कृतिक पर्व है। इस पर्व के सम्पादन, संयोजन में प्रतीकों के माध्यम से पर्व की समुचित व्यावहारिकताओं के दर्शन होते हैं।

 

प्रकाश प्रतीक है ज्ञान का

दीपावली या दिवाली शब्द के उच्चारण मात्र से ही हमारे अंतर्मन में एक आनंदमय चेतना जाग्रत होती है। याद आती है गांव-क़स्बों में सिर पर बड़ी-सी टोकरी में रखे दीयों को बड़े ही सुंदर ढंग से सहेजकर धीमे-धीमे क़दमों से गली-गली, घर-घर दीये रखने जाती कुम्हारिन मावसी, जिसके दीयों से जगमगा उठते हैं घर-आंगन, द्वार-देहली, मंदिर, चौपाल। यह जगमगाहट है कुम्हार की कड़ी मेहनत की और पसीने से फला दीया प्रतीक है ज्ञान का। दीया प्रेरणा भी देता है है कि जलकर भी प्रकाश देना चाहिए। प्रकाश फैलाना उसकी मूल प्रकृति है। वह तो प्रतीक है प्रकाश का। प्रकाश यानी ज्ञान। प्रकाश यानी शिव। प्रकाश प्रतीक है आशा, आनंद, सम्पन्नता और ऐश्वर्य का। ऐश्वर्य की देवी हैं लक्ष्मीजी। लक्ष्मी पूजा की जमावट और सजावट में शुद्धता, शुचिता और पवित्रता का बड़ा ही प्रतीकात्मक समायोजन होता है।

 

अर्थ की पूजा का उत्सव

लक्ष्मी धन की देवी हैं अत: यह वणिक पर्व भी है। व्यवसायी, व्यापारी और उद्योगपति आज से अपना बहीखाता पूजन में लक्ष्मी जी के सम्मुख रखते हैं। बहीखाते में कुंकुम से ॐ और स्वस्तिक बनाया जाता है। स्वस्तिक गणेशजी के चारों हाथों का प्रतीक है और यही चतुर्मुख ॐ भी है। भाव यह है कि श्रीगणेश व्यापार-व्यवसाय को निर्विघ्न बनाए रखें। पुराना बहीखाता बदलकर वणिक अपना नया व्यवसाय वर्ष प्रारम्भ करते हैं। लक्ष्मीजी के चित्र के आसपास शुभ-लाभ लिखकर हाथों से स्वर्ण मुद्राएं बरसाने वाली लक्ष्मी माता की पूजा की जाती है।

 

सभी के प्रति आदरभाव

लक्ष्मी माता का पूजन अपने-अपने सामर्थ्य से सभी लोग करते हैं। पूजा में अपनी श्रद्धा से स्वर्णाभूषण, अलंकार या मुद्रा आदि रखते हैं। साथ ही मिट्‌टी के छोटे-छोटे घड़े, घड़िया-घड़ोले में अनाज भरकर लक्ष्मीजी के सामने रखे जाते हैं। साथ ही झाड़ू भी पूजन में रखा जाता है। लक्ष्मीजी के साथ झाड़ू की पूजा करना हमारी उदात्त संस्कृति का परिचायक है। झाड़ू की पूजा दो बातों का प्रतीक है- एक तो छोटी से छोटी वस्तु के प्रति आदर भाव रखना तथा दूसरा झाड़ू यानी स्वच्छता का प्रतीक। कचरा घर में निकलता ही रहता है, जैसे कमरे की बरकत है, वैसे ही घर का मालिन्य दूर होकर धन की बरकत बनी रहे। झाड़ू हमारी आंतरिक सफ़ाई और स्वच्छता का प्रतीक भी है।

 

धन के साथ अन्न भी

लक्ष्मी पूजा के समय चौक कलश मांडकर पुष्प, पान, अक्षत के साथ नैवेद्य स्वरूप मिष्टान्न तो रखे ही जाते हैं, धान की लाई और बताशों का विशेष प्रसाद लगाया जाता है। पूजा लक्ष्मीजी की है किंतु उनके साथ ही देवी अन्नपूर्णा के दर्शन भी प्रतीकों के माध्यम से जाग्रत हो उठते हैं। लक्ष्मीजी की पूजा में मिट्‌टी के छोटे-छोटे घड़ूले, डुबलियां, चौघट और कुल्हड़ नवधान्य से भरे जाते हैं। कहीं-कहीं मिट्‌टी से बनी गुजरी पूजी जाती है, जिसे किन्हीं क्षेत्रों में ‘गुवालन' भी कहते हैं। इसके चार हाथों में चार घट होते हैं, जिसमें ज्वार, धान, मूंग, मूंगफली और सिर पर रखे मृदा घट में धान की लाई और बताशा भरकर लक्ष्मीजी के साथ पूजा की जाती है। किन्हीं क्षेत्रों में मिट्‌टी से स्वस्तिक की आकृति बनाई जाती है। इसके चारों छोर पर चार घड़ुले बनाए जाते हैं। इन्हें चौघट कहते हैं और इसमें नवान्न भरकर पूजा की जाती है। इन चार घटों के बीच एक बड़ा घट होता है, जिसमें खील-बताशे भरकर प्रसाद लगाया जाता है। हमारे देश का सम्पूर्ण आर्थिक ढांचा कृषि पर ही आधारित है। इस प्रकार की परम्पराओं को देखकर यही लगता है कि दिवाली अन्नपूर्णा और नवान्न का पर्व हैं। अन्न से भरे घड़ुलों की पूजा इस बात का उद्घोष है कि अन्न ही हमारी सम्पन्नता और समृद्धि का मूल है। जिन क्षेत्रों में कपास होता है, वहां के किसान धनतेरस के दिन मंडी में अपना कपास कांटे पर चढ़वाते हैं और उस धन से स्वर्ण-रजत के आभूषण ख़रीदकर पूजा में लक्ष्मीजी के सम्मुख रखकर अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं।

 

प्रतीकों का पावन पर्व

पूजा में लक्ष्मीजी के चित्र के पास स्वस्तिक बनाया जाता है। वैसे तो स्वस्तिक श्रीगणेश का प्रतीक है, किंतु लोक मान्यता यह है कि इसकी चारों भुजाएं चारों दिशाएं हैं। इन दिशाओं से शुभ, मंगल, नीरोग एवं ऐश्वर्य का संदेश मिलता रहे। तिजोरी या पूजाघर में त्रिशूल की आकृति बनाकर भी उसकी पूजा की जाती है। त्रिशूल प्रतीक है तीन प्रकार के शूल यथा दैहिक, दैविक और भौतिक ताप का। इन तापों से मुक्ति मिले इसलिए इस कामना से त्रिशूल आकृति को पूजा जाता है। श्रीलक्ष्मी की यंत्र के माध्यम से भी पूजा की जाती है। इसके लिए भीत पर सिंदूर से एक वर्गाकृति बनाकर उसमें दो आड़ी और दे खड़ी रेखाएं खींचकर बराबर नौ चौखाने बनाए जाते हैं। इन खानों में इस प्रकार अंक लिखे जाते हैं कि उन अंकों को आड़े या खड़े, जिस भी प्रकार से जोड़ा जाए तो योग पंद्रह ही होता है।

 

गृह लक्ष्मी का सम्मान

श्रीलक्ष्मी पूजा के साथ दीपावली के दिन विशेषकर निमाड़ क्षेत्र में बहुओं को टीका लगाकर व वस्त्राभूषण देकर मुंह मीठा कराया जाता है। यह भी एक प्रतीकात्मक परम्परा है कि बहू ही गृहलक्ष्मी है। इनकी पूजा से हर सुख, हर आनंद घर में रमता रहेगा। दीपावली की रात की यह मान्यता है कि लक्ष्मीजी हमारे पूरे घर में विचरण करती हैं, इसलिए विशेषकर पूजाघर और भण्डारगृह का दीपक अखण्ड जलता रहे यह सुनिश्चित किया जाता है। अन्न होगा तभी तो धन होगा। धन की देवी महालक्ष्मी की सभी पर कृपा होगी तो जनकल्याण होगा, आनंद का संचार होगा, ख़ुशियों की फुलझड़ियां छूटेंगी और जन के जीवन से तम के बादल छंटेंगे, तभी तो दीपावली सार्थक होगी।

/hxIYDGG5TE

बखरी में शक्तिपीठ दुर्गा मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए भूमि पूजन

08-12-2022 9:14 AM
/0gCTLrjfvP

Chhath Puja 2022 छठ घाट सजकर तैयार, व्रतियों का इंतजार, जानें- सूर्यास्त

30-10-2022 9:44 AM
/NSCKj81k28

महापर्व छठ: अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य आज, इस मंत्र के साथ दें

30-10-2022 9:35 AM
/1ZmZAHQgru

Chhath Puja Samagri List: छठ पूजा की तैयारी शुरू, जानिए सूपली में

27-10-2022 3:40 PM